माना जाता है की क्षेत्रीय भाषाओं के ग्राहकों को ऑनलाइन सामान खरीदने की आदत नहीं है इससे कुछ भी स्पष्ट नहीं होता है क्यूंकि देखा गया है की भारत के ऐसे दो-तीन शहर और कस्बे है जहा पर महँगी गाड़ी खरीदी जाती है

रेवरी लैंग्वेज टेक्नोलॉजीज का मानना है की जितनी भाषाएँ समानताएं पारम्परिक मिडिया पर है उतनी ही भाषाएँ इंटरनेट पर भी होनी चाहिए रेवरी लैंग्वेज टेक्नोलॉजीज की स्थापना 2009 में की गयी थी इसके संस्थापक सदस्य अरविंद पाणी, विवेक पाणी और एस. के. मोहांती है यह एक मजबूत विकास और शोध टीम का उदाहरण पेश करती है डिजिटल की दुनिया में भाषा समानता लाने के लिए रेवरी, टेक्नोलॉजीज का निर्माण  करने में जुटी हुई है रेवरी ओईएम और चिपसेट निर्माताओं के साथ काम करती है

लोकलाइजेशन सर्विस 

इस प्लेटफार्म पर लोकलाइजेशन सर्विस जैसे स्थानीय भाषा के अनुवाद, ट्रांसलिटरेशन, डिवाइस इनपुट, और ए.पी.आई का विकल्प भी उपलब्ध है जिससे आप आसानी से असल शब्दों में खोज सकते है यह प्लेटफार्म व्यापारिक दुनिया के लिए उपलब्ध है ताकि वास्तविक समय में आपके ग्राहक डिजिटल भाषा में से अपनी मन पसंद भाषा का इस्तेमाल कर सके

भाषा संगठन का व्यापारिक विस्तार 

भारत में 1.3 करोड़ भारतीय है 22 आधिकारिक मान्यता प्राप्त भाषा और 720 बोलियां बोलते है भारत में बोली जाने वाली प्रत्येक भाषा 40 किलोमीटर के बाद बदलती रहती है और 122 भाषा 10 हजार से ज्यादा लोगो द्वारा बोली जाती है

डिजिटल इंडिया की भ्रांतियां 

भ्रान्ति 1 : माना जाता है की क्षेत्रीय भाषाओं के ग्राहकों को ऑनलाइन सामान खरीदने की आदत नहीं है इससे कुछ भी स्पष्ट नहीं होता है क्यूंकि देखा गया है की भारत के ऐसे दो-तीन शहर और कस्बे है जहा पर महँगी गाड़ी खरीदी जाती है

भ्रान्ति 2 : ज्यादातर, रिजनल भाषाओं के उपभोक्ता टीयर 3-4 शहरों के रहने वाले होते हैं-  इसके विपरीत, टियर 1 शहरों में डिजिटल मीडिया पर 70 प्रतिशत से अधिक ऑनलाइन ट्रैफिक भी क्षेत्रीय भागों से आता है. लेकिन आप इसे ध्यान से देखेंगे तो समझेंगे कि विभिन्न भाषा के प्रवासी ट्रैफिक बनाते है . जहाँ वे राज्य की प्रमुख भाषाएं सीखनें लगते हैं लेकिन कार्यस्थल वाली भाषा के अलावा वापस घर जाकर अपनी घरेलू भाषा का इस्तेमाल करते हैं

सच्चाई से बहुत दूर 

स्थानीय भाषा के उपयोगकर्ता के लिए वेबसाइट पर शॉपिंग कार्ट की इमेज को देखकर भ्रम पड़ जाते है क्यूंकि वे सब सुपर मार्केट से खरीदारी करने के आदी  नहीं होते है इसलिए उन्होंने अपने जीवन में एक शॉपिंग कार्ट भी न ही देखा होगा और न ही ख़रीदा होगा

नेविगेशन संरचना 

भारतीय उपभोक्ताओं को मुश्किल नेविगेशन संरचना या हैवी कंटेंट दूर कर सकती है. भारतीय उपयोगकर्ता को आकर्षित करने के लिए उपयुक्त इमेज के साथ बड़े फ़ॉन्ट अच्छी तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं. भारतीय उपभोक्ताओं के लिए बेवसाइट की डिजाइनिंग बेहद महत्वपूर्ण है उदाहरण के तौर पर, मलयालम जैसी भारतीय भाषाओं में कुछ शब्द या वाक्यांश, अंग्रेज़ी भाषा के बराबर की लंबाई 1.5- 2x हो सकते हैं और इसे विशेष रूप से मोबाइल वेबसाइटों और ऐप्स के लिए नहीं बनाया जा सकता है

आधी से ज्यादा आबादी के पास ई-मेल आईडी मौजूद नहीं 

भारतीय उपभोक्ताओं के एक बड़े प्रतिशत के पास नेट बैंकिंग, क्रेडिट या डेबिट कार्ड जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं हुई है , इसलिए ग्राहकों के इस सेगमेंट की बिक्री बढ़ाने के लिए कैश ऑन डिलीवरी का विकल्प उपलब्ध कराया जाता है. ऐसी ही समस्याओं में से एक ईमेल एड्रेस भी थी लेकिन अब एमेजन, फ्लिपकार्ट और कई शॉपिंग बेवसाइट्स ने अधिकांश भारतीयों को मोबाइल नंबर से साइन अप करने का विकल्प दे दिया है क्योंकि भारत की आधी से ज्यादा आबादी  के पास ई-मेल आईडी मौजूद नहीं है . इसलिए कंपनियां  मोबाइल नंबर के साथ साइन अप करने या लॉग इन करने का विकल्प उपलब्ध करा रहीं है जिससे ऐसे  यूजर्स को ऐसी स्कीमों का फायदा मिलता रहे

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